पुरी (ओडिशा): विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की भव्य यात्रा के साथ कई प्राचीन धार्मिक परंपराएं भी निभाई जाती हैं। इनमें सबसे खास मानी जाती है ‘अधर पना’ की रस्म, जिसमें भगवान को अर्पित किए गए बड़े मिट्टी के घड़ों को पूजा के बाद रथ पर ही तोड़ दिया जाता है। हैरानी की बात यह है कि इस पेय को न तो श्रद्धालु ग्रहण करते हैं और न ही मंदिर के पुजारी।
रथ यात्रा के अंतिम चरण में आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन यह अनुष्ठान किया जाता है। दूध, ताजा पनीर, चीनी, केला, तुलसी और सुगंधित मसालों से तैयार विशेष पेय को बड़े मिट्टी के घड़ों में भरकर तीनों रथों पर भगवान के मुख के पास रखा जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार और पूजा के बाद इन घड़ों को वहीं फोड़ दिया जाता है, जिससे पूरा पेय रथ के चारों ओर फैल जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह पेय सामान्य महाप्रसाद नहीं होता। इसे उन सूक्ष्म एवं दिव्य शक्तियों को समर्पित किया जाता है, जो रथ यात्रा के दौरान भगवान के दर्शन के लिए उपस्थित मानी जाती हैं। यही वजह है कि इस प्रसाद का सेवन कोई भी नहीं करता।
मान्यता है कि ‘अधर पना’ की यह परंपरा केवल भगवान की पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि और अदृश्य लोक के प्रति सम्मान और समर्पण का प्रतीक है। यही कारण है कि सदियों पुरानी यह रस्म आज भी जगन्नाथ रथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती।



