पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खरड़ में किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खरड़ में किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी है। अदालत ने यह आदेश मास्टर प्लान की अनुपस्थिति और उसके निष्पादन में हो रही देरी के कारण जारी किया है। कोर्ट ने पंजाब सरकार को 27 मई तक इस मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मामला “ओमेगा इंफ्रा एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड बनाम राहुल तिवारी एवं अन्य” से संबंधित है, जिसमें हाईकोर्ट ने मास्टर प्लान के बिना खरड़ में हो रहे अनियंत्रित और अव्यवस्थित निर्माण कार्यों पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।
-2010 में बने थे मास्टर प्लान
खरड़ के लिए मास्टर प्लान पहली बार 2010 में तैयार किया गया था, लेकिन उस समय से लेकर अब तक उसे लागू नहीं किया जा सका। 2020 में एक नया मास्टर प्लान तैयार किया गया था, लेकिन वह भी अब तक नोटिफाई नहीं किया गया है। इस देरी के कारण इलाके में अव्यवस्थित निर्माण हो रहा है, जो पर्यावरण और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से खतरे की घंटी साबित हो सकता है।
-क्यों हाईकोर्ट ने लिया कड़ा कदम?
हाईकोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और मास्टर प्लान के बिना नए निर्माण कार्यों को रोकने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक नया मास्टर प्लान लागू नहीं होता, तब तक सभी नए निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध रहेगा। इस फैसले ने पंजाब सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है, क्योंकि कोर्ट ने पहले भी राज्य सरकार को कई बार कार्रवाई करने के आदेश दिए थे, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं आया।
-हाईकोर्ट का आदेश और पंजाब सरकार की जिम्मेदारी
इस आदेश के तहत, अब तक खरड़ में कोई भी नया निर्माण कार्य बिना सरकारी मंजूरी के नहीं हो पाएगा। पंजाब सरकार से यह भी पूछा गया है कि आखिरकार उसने अब तक मास्टर प्लान को क्यों नोटिफाई नहीं किया है और इसके लिए कितनी देर होगी। इस मामले में पंजाब सरकार को 27 मई तक जवाब देना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह की स्थितियों से बचा जा सके।
-क्या है बिल्डर्स की स्थिति?
बिल्डर्स और निर्माण कंपनियों के लिए यह आदेश किसी झटके से कम नहीं है। एक प्रमुख बिल्डर कंपनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए मांग की थी कि नया मास्टर प्लान जल्द से जल्द लागू किया जाए ताकि निर्माण कार्यों में कोई और बाधा न आए। कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करते हुए सरकार को सख्त निर्देश दिए थे, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे बिल्डर्स और नागरिकों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है।