करीब 22 वर्षों तक हत्या के मामले में जेल की सजा काटने वाले एक व्यक्ति को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च अदालत ने पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव में आरोपी अर्जुन जानी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही अदालत ने इस पूरे मामले को आपराधिक न्याय प्रणाली की गंभीर विफलता बताते हुए जांच और अभियोजन की प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की।
यह मामला वर्ष 2004 का है, जब ओडिशा के नबरंगपुर जिले के हिरली गांव में तीन महिलाओं की हत्या हुई थी। पुलिस ने एक कथित प्रत्यक्षदर्शी के बयान के आधार पर अर्जुन जानी को गिरफ्तार किया था। बाद में कथित कबूलनामे और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया गया और लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की दोबारा समीक्षा करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता केवल ठोस, कानूनी और भरोसेमंद साक्ष्यों के आधार पर ही छीनी जा सकती है, न कि संदेह या कमजोर जांच के आधार पर।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को दो दशक से अधिक समय तक जेल में रहना पड़े, तो यह केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की सामूहिक विफलता का उदाहरण है। कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया में हुई गंभीर कमियों पर भी चिंता व्यक्त की।
सभी तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अर्जुन जानी को बाइज्जत बरी करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया। यह फैसला एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि निष्पक्ष जांच और मजबूत साक्ष्य किसी भी आपराधिक मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला हैं।


