मिडिल-ईस्ट में चल रही जंग ने वैश्विक बाज़ार में हलचल मचा दी है।
तेल और गैस की आपूर्ति पहले ही बाधित है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर संघर्ष लंबा चला, तो इसका असर खाद, दवा और खाने-पीने की वस्तुओं तक दिखने लगेगा।
तेल और LPG संकट चरम पर
अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ती तनावपूर्ण परिस्थितियों ने तेल संकट को और गहरा दिया है। कतर के सबसे बड़े LNG प्लांट पर हमला होने की खबर के बाद क्रूड ऑयल के दाम $113 प्रति बैरल तक पहुंच गए। होर्मुज स्ट्रेट की संभावित बंदी ने वैश्विक तेल बाजार को झकझोर दिया।
भारत और अन्य एशियाई देशों में एलपीजी की किल्लत बढ़ती जा रही है। हालांकि सरकार ने उत्पादन बढ़ाने और LPG ATM जैसी पहल शुरू की है, लेकिन कई शहरों में गैस की आपूर्ति अब भी अस्थिर बनी हुई है।
दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी
युद्ध का असर स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। दिल्ली ड्रग ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आशीष ग्रोवर का कहना है कि दवाओं के लिए अधिकतर कच्चा माल आयात किया जाता है। एल्यूमिनियम और प्लास्टिक की बढ़ती कीमतें पैकेजिंग लागत बढ़ा रही हैं, जिससे दवाओं की कीमतों में इजाफा हुआ है। आम बीमारियों की दवाओं पर असर साफ दिखाई दे रहा है, हालांकि अभी मार्केट में स्टॉक मौजूद है।
खाद और फर्टिलाइज़र संकट
फर्टिलाइज़र की आपूर्ति पर भी युद्ध का असर पड़ रहा है। खाड़ी क्षेत्र और अन्य स्थानों के कई प्लांट बंद हैं या बंद होने की कगार पर हैं। फर्टिलाइज़र उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस आवश्यक है और उत्पादन लागत का करीब 70% इसके लिए खर्च होता है। ग्लोबल यूरिया मार्केट पहले ही कमी से जूझ रहा था, और चीन ने घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए यूरिया सहित अन्य उर्वरकों के निर्यात पर रोक लगा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी आपूर्ति बाधा के कारण विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
खाने-पीने की चीजों पर बढ़ती महंगाई
खाद की कमी का सीधा असर खाने-पीने की वस्तुओं पर दिखाई दे रहा है। दुनिया के लगभग आधे खाद्य पदार्थ फर्टिलाइज़र के इस्तेमाल से उगाए जाते हैं। इसके चलते, अगर सप्लाई में रुकावट लंबी चली, तो संकट गहरा सकता है। एलपीजी की कमी से चाय-नाश्ता, होटल और रेस्टोरेंट बिजनेस प्रभावित हो रहा है, और खाने-पीने की वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी है कि मिडिल-ईस्ट युद्ध केवल ऊर्जा संकट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह वैश्विक खाद्य और स्वास्थ्य संकट में भी तब्दील हो सकता है।