सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
चंडीगढ़ स्थित पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGI) में गरीब और गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों के इलाज के लिए मिले सरकारी फंड में बड़े स्तर पर गड़बड़ी सामने आई है। जांच में खुलासा हुआ है कि 1.14 करोड़ रुपये से अधिक की रकम फर्जी तरीकों से निकाल ली गई। इस मामले में लंबी जांच के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने FIR दर्ज कर ली है।
प्राइवेट ग्रांट सेल बना घोटाले का केंद्र
CBI की जांच में सामने आया कि यह पूरा खेल PGI के प्राइवेट ग्रांट सेल में वर्षों से चल रहा था। मरीज़ों के नाम पर नकली मेडिकल फाइलें और फर्जी बिल तैयार किए गए। हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में उन मरीज़ों के नाम पर पैसे निकाले गए, जिनकी पहले ही मौत हो चुकी थी। कुछ ऐसे लोगों के नाम भी इस्तेमाल किए गए, जिन्होंने कभी PGI में इलाज तक नहीं कराया।
RTI से हुआ घोटाले का पर्दाफाश
यह घोटाला सूचना का अधिकार (RTI) के तहत सामने आया। कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स की जॉइंट एक्शन कमेटी के अध्यक्ष अश्विनी कुमार मुंजाल द्वारा दाखिल RTI के जवाब में कई गंभीर अनियमितताएँ उजागर हुईं। रिपोर्ट में फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड, नकली बिल और बिना वैध प्रक्रिया के धन निकासी के कई मामले दर्ज हैं।
बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाओं का भुगतान
जांच में यह भी सामने आया कि करीब 88.12 लाख रुपये की रकम दवा विक्रेताओं को बिना किसी डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के ट्रांसफर की गई। इसके अलावा, 50.11 लाख रुपये ऐसी दवाओं के नाम पर खर्च दिखाए गए, जो कभी लिखी ही नहीं गई थीं।
मृत मरीज़ों के नाम पर लाखों की निकासी
CBI के अनुसार, तीन मृत मरीज़ों के नाम पर कुल 27.66 लाख रुपये निकाले गए। एक मामले में तो मरीज़ की मृत्यु के बाद भी 11 लाख रुपये से अधिक की राशि बांट दी गई। कुछ PGI कर्मचारियों और उनके परिचितों को मरीज़ों का फर्जी रिश्तेदार दिखाकर लगभग 19 लाख रुपये निकाले गए। जांच के दौरान इन मामलों से जुड़ी फाइलें और सॉफ्टवेयर डेटा भी गायब पाए गए।
न इलाज हुआ, न पर्ची बनी, फिर भी भुगतान
जांच में यह भी पाया गया कि कई मरीज़ों का PGI में कोई इलाज नहीं हुआ, फिर भी उनके नाम पर भुगतान कर दिया गया। फर्जी बिलों के जरिए 6.96 लाख रुपये निकाले गए। एक ही इलाज के लिए दो अलग-अलग फाइलों से पैसे निकालने का भी मामला सामने आया, जिनमें से एक फाइल मृत मरीज़ की थी।
2017 से 2021 तक चला घोटाला
यह घोटाला वर्ष 2017 से 2021 के बीच हुआ, लेकिन इसका खुलासा अक्टूबर 2022 में हुआ। इसके बावजूद PGI प्रशासन ने लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। बाद में एक आंतरिक जांच समिति गठित की गई, जिसकी पहली बैठक अक्टूबर 2023 में हुई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जांच के दौरान कई आरोपी कर्मचारी PGI में अपनी सेवाएँ देते रहे।
CBI को सौंपी गई जांच


